Friday, January 15, 2010

पढाई से ठन गई !


ठन गई ठन गई
पढाई से ठन गई
किताबो से जूझने का मेरा कोई इरादा न था
कभी पढूंगा इसका कोई वादा न था
खुद से करके वादा में कहता हु रोज़
बस अब न करूँगा और मौज
परन्तु खता जो हू शाहीभोज
सो अब भी जरी है पढाई की खोज
अब और पढ़ा तो समझो जान गई
ठन गई , पढाई से ठन गई




इन्टरनेट का खेल है ये
ऑरकुट और फेसबुक का मेल है ये
बड़ा सुंदर जेल है ये
एक अदृश्य दुनिया में रोज़ खो जाना
साला पढ़ते पढ़ते सो जाना
चैटरूम वाली पट गई
एक नयी जिंदगी बस गई
ठन गई पढाई से ठन गई ।




अब तो शुरुआत होती है १२ बजे उठने से
क्या करे मन जो अब गया है अब पढने से
पढलिख कर भी क्या करना है
एक दिन तो वैसे ही मरना है
गर्लफ्रेंड के ख्वाब में तन्मयता से खो जाता है
इंडिया के फ्यूचर रोज़ सो जाता है
पढाई का बढ़ गया है टेंशन
पर हॉस्टलवाले कहते है नो मेंशन
रात भर गर्लफ्रेंड से बात करते है
दिन भर लैपटॉप पर गर्व से मुवियाँ देखते है
हॉस्टल लाइफ दिलो दिमाग में ठस गई
ठन गई पढाई से ठन गई




मन में २४ घंटे लडकियों का वास
बना फिरता हू देवदास
जाना चाहता हू वनवास
पर पहुच जाता हू हौजखास
मै किशन वो राधा जीवन आधा
पढाई में यही तो है बाधा
रोज़ छोले चावल की प्लेट सामने आजाती है
पढाई तो अधर में चली जाती है
पूरी दुनिया मुझ पर हँस गई
ठन गई पढाई से ठन गई





खुद से कोई गिला नहीं
अगर पढने को कोई साथी मिला नहीं
वैसे भी कौन पढता है
क्या मेरी बुद्धि में भला इतनी जड़ता है
यहाँ तो सब खुले सांड है
क्युकी गोल्डफ्लेक और गोडांग गरम यहाँ के नए ब्रांड है
इन आदतों से तो जिन्दगी बच गई
पर हॉस्टल लाइफ जच गई
ठन गई पढाई से ठन गई।

Thursday, January 14, 2010

तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले


मेरे सपनो की दुनिया में एक खूबसूरत सा शहर था ,
जिसके पास एक शजर था जहाँ एक लड़की का घर था ,
जब जब में वहाँ से गुजरता था ,
अक्सर एक ही बात किया करता था ,
की तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले ।


एक समय की बात थी ,
जब मुझे उसकी तलाश थी ,
बस यही गुनाह मै रोज़ किया करता था ,
दिन मै २-३ बार उसके घर के चक्कर काट लिया करता था ,
और उस मोहल्ले के मवालियों को अक्सर ललकारते हुए कहा करता था
की तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले


जब जब वो लड़की मेरे मोबाइल पर मिस कॉल करती थी
तो मै सोचता था की दुनिया मै बस वही एक मिस है जो मुझे कॉल करती थी
मिस का कॉल आते ही मै अपनी बाइक लिए फिर उसी मोहल्ले की तरफ निकल पड़ता था
किसी की न सुनता और कभी कभी घरवालो से भी लड़ लिया करता था
और मोहल्ले से गुजरते हुए उसकी आँखों मै देखते हुए कहता था
की तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले ।




इस तरह धीरे धीरे बात आगे बढ़ने लगी
और जिन्दगी की रेलगाड़ी प्लेटफॉर्म पर चढ़ने लगी ,
पर मुझे नहीं पता था की इस प्लेटफॉर्म पर बहुत से कुली खड़े होंगे
जो उसके लिए हसते हसते सूली चढ़ने चले होंगे
एक दिन मुझे पता चला की आज उसकी शादी है
मैंने सोचा अब और क्या बचा बाकी है
मै फिर से अपने दुःख को समेटे उसकी मोहल्ले की तरह यह कहते हुए निकल पड़ा
की आज भी तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले

Monday, January 11, 2010

पहचान कौन ?



एक दिन अचानक किसी लड़की का फ़ोन आया
मेने फ़ोन झट से उठाया
मेने पुछा कौन बोल रहा हे
उसने कहा में बोल रही हू
मैंने कहा मै तो बकरी बोलती है
उसना कहा फिलहाल तो तेरे फोन पे एक छोकरी बोलती है
मैंने सोचा क्यु न हो जाऊ एकदम मौन ...
तभी अचानक उसने कहा पहचान कौन ?


मैंने कहा तू तो जरुर अंजलि होगी
उसने कहा नहीं ये तो कोई करमजली होगी
तभी मेने अपने जुओं से भरा सर खुजाया
और तभी मेरे दिमाग में एक आईडिया आया
मैंने कहा सच सच बता तू है कौन ?
उसने फिर से कहा पहचान कौन ?


अब मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था
दिल है की धड़का जा रहा था
मैंने कहा तू मुझे इतना मत सता
उसना कहा तो चुपचाप मेरा नाम बता
मैंने तुतलाते हुए कहा क्या मैंने तुझे छेला है
उसना कहा सच सच बता तेरा कितनी लडकियों से झमेला है
मैंने कहा ये सब पूछने वाली तू है कौन
उसने फिर से कहा तो पहचान कौन ??



मुझसे हुई ये खता मुझे तेरा नाम नहीं पता
उसने कहा तू तो है ही गधा जो तुझे कुछ नहीं पता
मैंने कहा क्यु बजा रही है मेरी जुन्दगी की रिंगटोन
उसने फिर से कहा पहचान कौन /??



मेरे भेजे में फिर से एक लड़की का नाम आया
और मेने इस बार बिना सर खुजाये कुछ इस अंदाज़ में गया की --
जादू तेरी नज़र खुशबु तेरा बदन तू हा कर या न कर तू है मेरी किरन
उसने कहा -
जादू तेरी नज़र खुशबु तेरा बदन तू हां कर या न कर मै हू तेरी बहन ...






बहन सुनते ही मेरे दिल के अरमान टूट गए
और मेरे गर्लफ्रेंड के ख्वाब टूट गए
मै अपने ख्वाबो से बहार निकल आया
और रजाई ओड़ के चुपचाप सो गया
की अब न उठाऊंगा कभी फ़ोन
ताकि कोई कह न सके पहचान कौन ?????

Wednesday, December 30, 2009

एक अनथक यात्री


कहीं पेड़ो की शाखे थी झुरमुट
निकला था पहने मृगतृष्णा का मुकुट
चेहरे पर मंद मंद मुस्कान लिए
आँखों में अजब सा तूफ़ान लिए
चलना चाहता था मै सैलाब लिए
किन्तु आसान नहीं थी डगर
ऊपर से जीवन एक अजायबघर
लोगो की संदेहास्पद शक्लें
जिन पर ठहरी हुई उनकी अक्लें
निरंतर सहज भाव से असहज होकर
अपने आपको मुझमे खोकर ...
एक अधस्वप्न लिए मुझे घूर रही थी
सोच रही थी कि ये यात्री कहाँ तक सफ़र करेगा
कितने दुःख और पीडाओं को समाज का दायित्व समझ कर भोगेगा
मगर मुझे आगे जाना था ,कुछ खोना कुछ पाना था
निरंतर अपने आपको करके सुपुर्द इस जीवन में
चला जा रहा था निर्जन वन में
इतने कष्ट और पीडाएं सहने के बाद भी
न जाने कौन सा अभिलाषा उसे आगे ले जा रही थी
उसे विश्वास है कि वो पहुचेगा मंजिल पर एक दिन
इसलिए वो है एक अनथक यात्री

Monday, December 28, 2009

झंडे , डंडे और मुस्तंडे


माना जाता है की छुआछूत आज भी इस देश में है , इस समस्या से पार पाने में बड़े - बड़े पोंगा पंडितो ने भी कहा है की जाती प्रथा वर्ण व्यवस्था तो भारत से कभी नहीं जा सकती......... अगर कोई इस जात पात से बचा है तो वो है राजनीती , वो कहते है न की राजनीती में कोई अछूत नहीं ...
तो यही से बात निकलती है झारखण्ड राज्य में हुए इस वर्ष के चुनाव परिणामो से जहाँ "झारखण्ड मुक्ति मोर्चा " एक मात्र ऐसी पार्टी उभर कर आई है जिसे सबसे ज्यादा (१८) सीट मिली । इसके बाद कांग्रेस गठबंधन को २५ और बीजेपी गठबंधन को २० सीटे मिली ....
आपने अखरोट की तरह टूटते जीवन में शायद गुरूजी 'शिबू सोरेन ' को एक बार फिर मोका मिला है की वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी कमर तोड़ सके और इस बार भाग्य भी उनका साथ देता नज़र आ रहा है ... क्युकी कल तक जिस बागी नेता को बीजेपी गलिया देती आई थी आज उसी के साथ हाथ में हाथ डाल कर ' हम होंगे कामियाब एक दिन ' के नारे लगा रहे है ...
बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अपने अध्यक्ष बन्ने की ख़ुशी में पार्टी को एक नया तोहफा देने के लिए शायद गुरूजी के चरण स्पर्श कर लिए और गुरूजी ने भी दक्षिणा में गठबंधन का एकलव्य नुमा अंगूठा मांग लिया ॥ क्युकी गुरूजी तो ठहरे गुरूजी जिनकी बचपन से एक ही तमन्ना रही हे की झारखण्ड का सी एम् बनना है .... इस बार फिर गुरूजी चिल्ला चिल्ला के कह रहे है की 'फिर वही दिल लाया हूँ मगर इस खिचड़ी सरकार में बीजेपी ने असंतोष जताते हुए गुरूजी के सी एम् बन्ने के फैसले को फिलहाल तो अधर में लटका दिया है।
राजीव प्रताप रूडी ने आपनी पार्टी के निष्पक्ष और विश्वसनीय नेता होने के naate विरोध भी जाता दिया हे की जिस नेता को हम पिछले कई सालो गलिया देते आ रहे है और जिसका विरोध करना ही हमारी पार्टी का मेन मकसद रहा हे उसके साथ अपने झंडे , डंडे और मुस्तंडे क्यों मिलवाये , मतलब क्यों गुरूजी के साथ सरकार बनाये ,,
जहाँ तक बीजेपी का सवाल है तो उनके नए अध्यक्ष भाऊ गडकरी से काफी उम्मीदे थी पर वो भी उस्सी तरह की राजनिति को आगे बढ़ाते दिख रहे जो बीजेपी में हमेशा से चलते आरही है ॥
खैर इससे एक बात तो अब आम जनता को समझ में आ ही गई है की राजनीती में न तो कोई नैतिकता होती है न कोई सिद्धांत होता हे अगर कुछ होता तो एक लक्ष्य कुर्ती को पाने का लक्ष्य ....
तो झारखण्ड के चुनाव नतीजो से जो खिचड़ी सरकार बनती नज़र आ रही हे वो यह है की - " इस हमाम में किसी के पास अंडरवेयर नहीं है ".....

Saturday, October 10, 2009

अंधा बाँटें रेवड़ी , ओबामा को देई


हिन्दी की फेमस कहावत है की "अंधा बाटें रेवड़ी , अपने अपने को देई " आज काफी सालो बाद इस कहावत से साक्षात्कार हुआ है । किसी ने सही ही कहा की जब अंधा आदमी रेवड़ी बाटता है तो ख़ुद को ही देता .
वैसे नोबल कमिटी की तरफ़ से बयां आया है की -" ओबामा ने जिस तरह से दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खीचा और अपने लोगो को बेहतर भविष्य की उम्मीद जगाई वैसा कोई बिरला नही कर पता "
९ अक्टूबर २००९ शायद दुनिया के इत्तिहास में दर्ज होने वाली तारीख थी जब अमेरिका के प्रेसि। ओबामा को नोबल पुरस्कार दिया गया
वैसे तो ओबामा को शान्ति के लिए नोबल पुरस्कार मिलना एक अचम्भा ही कहा जा सकता है क्युकी नोबल पुरस्कार के लिए नोमिनेशन की जो आखरी तारीख थी वो '१ फरवरी ' थी परन्तु ओबामा राष्ट्रपति २० जनवरी को बने तो क्या इतनी जल्दी से ही फ़ैसला हो गया की ओबामा साहब तो शान्ति के दूत बन कर इस धरती पर उतरे है ।
और अमेरिका के किसी प्रेसिडेंट को नोबल प्राइज दिया जन वो भी शान्ति के लिए ये तो एक हस्स्यस्पद बात कही जायेगी ।
वैसे मनमोहन सिंह ने इस पर काफी खुशी जताते हुए ये कहा है की ओमाबा एक इसे व्यक्ति है जिन्होंने ये कहा है की -" आज के अमेरिका की जड़े महात्मा गाँधी के भारत से निकलती है " वाह !! काश ओबामा यह कहते की आज के अमेरिका की जड़े सोनिया गाँधी के विचारो से चलती है तो जनाब मनमोहन सिंह तो ओबामा को बिना मरे ही परमवीर चक्र दे देते। वैसे इरान के प्रेसिडेंट ने कहा है की - ओबामा को नोबल मिलने से हम अपसेट नही है बस उम्मीद करते है की अब तो वो दुनिया से नाइंसाफी मिटने के लिए व्यावहारिक कदम उठाना शुरू करेंगे ।
वैसे ओबामा ने कुछ शान्ति कयाम करने का भरसक प्रयास भी किया जैसे - नॉर्थ कोरिया के साथ कामियाब डिप्लोमेसी करने की कोशिश की, मुस्लिम देशो को साथ लेने की कोशिश की , ४८ साल बाद इरान और म्यांमार जैसे देशो से बातचीत के रस्ते निकले , वैसे ओबामा की ग्लोबल डिप्लोमेसी का फोकस था मुस्लिम जगत तक पहुचना ।
पर क्या इतने काम काफ़ी है नोबल पुरस्कार पाने के लिए ये , क्युकी इतिहास गवाह है की अमेरिका के प्रेसिडेंट हमेशा बदलते है परन्तु उनके देश की नीतिया कभी नही बदलती । और अगर बात शान्ति का है तो ओबामा का ट्रैक रिकॉर्ड अभी भी बुश से किसी मायने में काम नही है , उनके सत्ता में आने के तुंरत बाद ही उत्तर कोरिया ने परमाणु परिक्षण किया और इरान भी काफी हद तक पहुच ही गया है , पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इराक से अमेरिकी फौजे वापस आने थी परन्तु ऐसा नही हुआ , उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अफगानिस्तान की है जहाँ हालत दिन पे दिन बिगड़ते ही जा रहे है , पकिस्तान में ओबामा बुश की गलतिया दुगने उत्साह से दोहरा रहे है क्युकी उसे दी जान वाली सहायता राशी ३ गुनी कर दी गई है बगैर ये जाने की वो दी जाने वाली राशि का उपयोग अपने पड़ोसी देशो में आतंकवादी गतिविधियों के लिए तो नही कर रहा है , क्युकी हाल ही में पकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ की तरह से बयान आया है की अमेरिका से दी जाने वाली सहायता राशी का उपयोग भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में किया गया था ।
अंकल सेम के इस देश ने ही आज पुरी दुनिया में इतनी समस्याए खड़ी कर दी है की जिससे पार पाना बहुत मुश्किल हो गया है , भारत में व्याप्त कश्मीर समस्या के लिए भी अमेरिका ही जिम्मेदार है , अफगानिस्तान में तालिबान को अमेरिका ने अपने फायदे के लिए खड़ा किया जब वो उसी के लिए भस्मासुर बन गया तो फ़िर उसे ही मारने चला , दुनिया में सबसे ज्यादा एटमी हथियार आज अमेरिका का पास है , अमेरिका का इराक पे हामला करने का मकसद भी अब साफ़ हो गया है जब वो पुरी दुनिया को इराक का तेल सप्लाय कर रहा है , पकिस्तान में ड्रोन हमले अभी भी जारी है , हर देश में अपना सैनिक अड्डा बनाना अमेरिका का हमेशा से ही मकसद रहा है , दुनिया आज ये भालीभाती जान गई है की हर देश में मल्टीनेशनल कंपनीया लगा कर माल कमाने के आलावा अमेरिका ने आजतक कुछ किया नही है ।
ओबामा को नोबल पुरस्कार दिया जान वो भी शान्ति के लिए , फ़िर तो इस वाकिये पर वासिम बरेलवी का एक ही फेमस शेर याद आता है जो अगर वासिम बरेलवी साहब ने नही लिखा होता तो शायद ओबामा के द्वारा ही लिखा गया होता की -
जिंदगी तुझपे अब इल्जाम क्या रक्खे
तेरा एहसास ही एसा है की तनहा रक्खे।

Thursday, October 1, 2009

बड़े बाबू ने किया सच का सामना


कलेक्ट्रेट के बड़े बाबू रमेशचंद्र शर्मा गरम कुर्सी यानि हॉट सीट पर थे , अवसर था सच का सामना करने का । बाबू का जीवन भी कोई जीवन होता है न अवैध बच्चे , न अवैध सम्बन्ध , न कभी ड्रग्स ली न जेल गए , बचपन में बाप के डर से न ही सिगरेट पी , बड़े होने पर बीवी के डर से शराब को हाथ भी नही लगाया , यानि की कोई सच था ही नही सामना करने को इसलिए उन्हें भरोसा था की बगैर इज्ज़त गवाए और कपड़े उतरवाए एक करोड़ रुपए आसानी से जीत लेंगे।
सामने सोफे पर बैठने के लिए उनकी पत्नी , ससुर ओर माँ को बुलाकर बिठाया गया था ताकि बेइजत्ती ढंग से हो और कुछ इमोशनल क्लोस अप लिए जा सके ।
' पहला सवाल ' एंकर ने आत्मविश्वास या डर से मुस्कुराते हुए रमेश बाबू पर दागा " क्या आप बचपन में स्कूल से भाग कर अमिताब बच्चन की पिक्चर देखने जाते थे ?
रमेश बाबू चुप रहे वे जानते थे की १ रुपए ६० पैसे की फर्स्ट क्लास की टिकेट के लिए वो "बॉबी" और "शोले"जैसी फिल्मो की पिंजरे नुमा लाइन में लगे पुलिस के डंडे खाया करते थे , पर उन दिनों यह बुरी बात नही मानी जाती थी ।
हिम्मत करके बोले - सच है ,पोलिग्राफी टेस्ट के रिजल्ट लिए गब्बरनुमा म्यूजिक बजा " ये जवाब सही है " । एंकर ने रमेश बाबू की माँ से पुछा " माजी कैसा लग रहा है आपको ये सच जानकर " "कैसा क्या लग रहा है ये कौन सी नई बात है इसके बाबूजी ख़ुद तड़ी मार कर पिक्चर जाते थे मधुबाला की - माँ ने जवाब दिया ।
आप १ लाख रुपए जीत गए है लेकिन आगे के सवाल आपको परेशानी में डाल सकते है । सूट बूट धारी बड़े बाल वाला एंकर शर्टधारी अध्गंजे रमेश बाबू से।
" अगला सवाल क्या ये सच है की अपनी शादी में कँवर कलेवा के वक्त आपको एच एम् टी की हाथ घड़ी दी गई जबकि आप चाहते थे की आपको टेपरिकॉर्डर मिले "
रमेश बाबू की आँखों के सामने शादी का दृश्य घूम गया जवानी में वो यूनियन के लीडर थे , साथी उन्हें कॉमरेड कहते थे और थोड़े बहुत आदर्शवादी वो थे भी लेकिन वो ज़माना टेपरिकॉर्डर का था और उनकी दिलितमन्ना थी की चाहे कन्या एक जोड़े में घर आए पर उसके साथ एक टापरिकॉर्डर जरुर हो ताकि उसमे शादी के बाद मुकेश और लता के दर्द भरे गाने सुने जा सके ।
पसीना पोछ कर रमेश बाबू बोले - सच है ' जवाब सही था। कैमरा तुंरत रमेश बाबू के ससुर जी पर जूम हुआ "ससुर जी कैसा लग रहा है आपको ? क्या रमेशा बाबू यानि की आपके दामाद दहेज़ लोभी है? "
"मै तो चाहता ही नही था की मेरी बेटी की शादी किसी मास्टर या बाबू से हो जीवन भर तो ख़ुद का मकान बनवा नही पाते ये लोग प्रोविडेंट फंड से पार्ट , फाइनल निकलते है , बेटे की पढ़ाई के लिए 'एजूकेशन लोन ' का मुह ताकते है"।
स्मार्ट एंकर पस्त रमेश बाबू से - शर्मा जी आप बहुत अच्छा खेल रहे है पर आगे के सवाल आपके परेशानी मै डाल सकते है , आप तैयार है ? रमेश बाबू ने पत्नी की तरफ़ मंजूरी के लिए देखा , ख़ुद को टीवी पर पहली बार आने के ख्याल से ही वो इतनी खुश थी की इसे उसकी हामी समझ रमेश बाबू ने भी हामी भर दी ।
"अगला सवाल " - क्या ये सच है की अक्सर जब आपके नाई की दुकान पर बाल कटवाने जाते है , तो घंटो वहाँ बैठे घटिया मेग्ज़ीन पढ़ा करते है और घर आकर अपनी पत्नी को लम्बी लाइन का बहाना बना देते है ताकि सन्डे का कुछ समय आपके शब्दों मै "आराम से कट सके " । रमेश बाबू समझ गए इस सच को कबूल करने के बाद उनका सन्डे बर्बाद होने वाला था और श्रीमतिजी उनसे घर मै मकडी के जाले और पानी की टंकी साफ़ करवाने वाला काम करवाने वाली थी । पर सवाल ५ लाख का था लिहाज़ा जी कट्ठा कर के बोले - सच है , पोलीग्राफ टेस्ट की तस्दीक होते ही श्रीमतीजी शर्मा - " जभी मै सोचू की तुम्हारे बाल है ही कितने जो तुम हर रविवार कटवाने चले जाते हो अब बताना जाकर ।
तंदुरुस्त एंकर दुबले पतले रमेश बाबू से आप चाहे तो ये खेल छोड़ कर जा सकते है क्योकि आगे का सवाल आपका वैवाहिक जीवन बरबाद कर सकते है , शर्मा जी ने सोचा बचा ही क्या है बर्बाद होने को इसलिए वो पर्सनल सवाल का सामना करने को भी तैयार हो गए ।
"अगला सवाल " - क्या ये सच है की रोज़ सब्जी खरीदकर घर लाने के बाद आपके अपनी पत्नी को कम भाव बताते थे ? जबकि असल मे आपके ज्यादा दाम चुकाकर आते थे , उदाहरण के लिए आप गिल्की ८ रूपये पाव लाये तो आप भाभीजी को ४ रुपए कहते थे ताकि वो नाराज़ न हो जाए ?
अब रमेश बाबू घबरा गए कहीं ये सवाल उनका तलाक़ ना करवा दे ? पर १० लाख का सवाल था लिहाज़ा उन्होने लंबे इंतज़ार के बाद यानि तब तक दर्शक चॅनल बदलने के लिए रिमोट का बटन दबाने ही वाले थे की कहा - "सच है "
श्रीमती शर्मा सोफे पर पर करवट बदल रही थी रमेश बाबू की माँ के चेहरे पर मुस्कराहट थी और उनके ससुर समझ नही पा रहे थे की कौन सा एक्सप्रेशन दूँ ।
कमला जी , एंकर श्रीमती शर्मा जी की तरफ़ मुखातिब हुआ - क्या कहेंगी आप इस सच पर, रमेश बाबू की पत्नी की आँखों मे आंसू आ गए - " मुझे पहले ही शक था की इनकी बेवकूफी भरी शकल देख कर ही सब्जी वाली चार गुना दाम बता देती होगी और ये ले आते होंगे पर अब मुझे समझ मे आया की घर मे बचत क्यों नही होती , जब से शादी हुई है एक - एक चीज़ को तरस रही हूँ पर अब मे बर्दाश्त नही कर सकती, मै जा रही हूँ अपने माइके संभालो अपना घर "
सेट पे अफरा तफरी मच गई रमेश बाबू हॉट सीट से कूद कर श्रीमती शर्मा के पीछे भागे । और एंकर को यह सोचते - सोचते ब्रेक लेना पड़ा की ये सेल मिडिल क्लास लोग हिम्मत नही है सच का सामना करने की आगे से ऐसे लोगो पर "बैन"