Thursday, January 28, 2010

अमर घर चल ....


१९७४ में जब जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति के शेषनाग से राजनीती का समुद्र मथा था तो उसमे से कई रत्न प्रकट हुए थे । मुलायम सिंह यादव उनमे से एक थे बाद में वे जनता दल के प्रमुख नेता रहे और आखिरकार जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने कमंडल से मंडल आयोग के अंगारे देश भर में छींटे तो मुलायम सिंह ने अपनी झोली भर ली , आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में चल रहे राजनीतिक ब्राम्हिन भोज में मुलायम सिंह ने कंकर दाल दिए । देश भर के केसरिया आंधी मुसलमानों ने मुलायम सिंह पर इस कदर भरोसा किया की वि मुल्ला मुलायम तक कहलाये । इन्ही मुलायम सिंह की राजनीतिक पकड़ को एक चतुर राजनीतिज्ञ ने भांप लिया और उनमे केचुली के तरह जा चिपका वो थे अमर सिंह । अमर सिंह उस ज़माने में कांग्रेस की छोटी मोती पोलिटिक्स किया करते थे , उसकी व्यापारिक बुद्धि ने केलकुलेट कर लिया था की इस पहलवान के दावो के भरोसे वो दिल्ली तक मर कर सकते है । अमर सिंह जोड़ तोड़ और लंच डिनर के पोलिटीशन थे , वे लोगो पर एहसान करते और फिर उसकी कीमत वसूलते
,
सदी के महानायक अमिताब बच्चन को उन्होंने तब पकड़ा जब वो डूब रहे थे इसी को वो कैश कराकर अमित जी को जया ऐश्वर्या और अभिषेक सहित मुलायमी अखाड़े में खीच लाये । समाजवादी पार्टी के टाट पर उन्होंने जया प्रदा और संजय दत्त जैसे मखमली पैबंद चिपकाये । हालत धीरे धीरे ये हो गए की मुलायम सिंह अमर सिंह से पूछे बगैर जम्हाई भी नहीं लेते थे । जनता दल के जमीन से जुड़े नेताओ के पत्ते काटने लगे , आजम खान जैसे कद्दावर और राज बब्बर जैसे सुलझे हुए नेता अमर सिंह की शकुनी चलो का शिकार होते गए , लेकिन धीरे धीरे मुलायम के करीबी लोग चेते और और उन्होंने पहेलवान मुलायम की ओवर ओइलिंग करना शुरू कर दी , कल्याण सिंह को लाने के लिए उन्होंने मुलायम सिंह से शीर्षासन तक करवा दिया ।

ज़ाहिर है उनके सबसे विश्वस्त वोट बैंक मुस्लमान उनसे दूर जाने लगे , नतीजतन वो हर चुनाव में मात खाते गए । अचानक मिली हार ने मुलायम के भाई राम गोपाल यादव जैसो के कान खड़े कर दिए । और सबने मिलकर वीरू और जय की जोड़ी को विखंडित कर दिया । पहले अमर सिंह जब भी इस्तीफे की धमकी देते थे मुलायम खुद हाथ पैर जोड़ कर उन्हें वापस ले आते थे पर अबकी उन्हें मनाने कोई नहीं गया । ऐसा कोई दल नहीं बचा जिसमे अमर सिंह को पनाह मिले । शारीर और मन दोनों से थक चुके अमर सिंह को अब पता चल चुका है कि ड्राइंगरूम , पंचातारो , सितारों और शेरो शायरी की राजनीति ने उन्हें एकाकीपन के ऐसे रेगिस्तान में प्यासा छोड़ दिया है , जहाँ से निकलने का तोड़ उन्होंने सिखा ही नहीं । मुलायम सिंह की नर्सरी बुक में अब 'अ' अमर सिंह का कभी नहीं पढ़ा जायेगा ।

Wednesday, January 27, 2010

फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ....


ब्रिस्लारी की बोटल है ,
५ स्टार होटल है ,
मेकडोनाल्ड और पिज्जा हट का अम्बार है ,
आज गली गली में बियर बार है ,
रोलेक्स की घड़िया हाथों में सजी ,
पीटर इंग्लैंड से बाहें कसी,
घर में नहीं आटा ,
पैरो में बाटा ,
यहाँ तो सभी जगह नेम एंड फेम है ,
भला कोई मनुष्य नहीं ब्रांड नेम है ,
यही है आज के आजाद भारत की कहानी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ।




मंदी की मार है ,
आम आदमी की हार है
चारो और चाटूकार है ,
नेता मस्त है ,
जनता त्रस्त है ,
याद आ गए आटे दाल के भाव ,
जब खाने को रह गया सिर्फ बड़ा पाव ,
पिने को नहीं है साफ़ पानी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी




कोक , पेप्सी और थुम्स अप महफ़िल में है ,
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है ,
अलगाववाद और भाषावाद हावी है ,
जागरूक रहना अवश्यभावी है,
युवा भटक रहा है ,
नेता खटक रहा है ,
मल्टीनेशनल कंपनियों को मेला है ,
बड़ा गड़बड़ झमेला है ,
हर तरफ से हानि ही हानि,
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी,







आतंकवादी , नक्सलवादी , बढती आबादी
गायब हो गई बापू की खादी ,
बापू ने नमक कानून तोड़ा ,
तो हमने इंडियन पेनल कोड का हर कानून तोड़ा ,
किसानो की बदहाली है,
चारो तरफ कंगाली है,
यही है आज के गणतंत्र की कहानी ,
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ।

Friday, January 15, 2010

पढाई से ठन गई !


ठन गई ठन गई
पढाई से ठन गई
किताबो से जूझने का मेरा कोई इरादा न था
कभी पढूंगा इसका कोई वादा न था
खुद से करके वादा में कहता हु रोज़
बस अब न करूँगा और मौज
परन्तु खता जो हू शाहीभोज
सो अब भी जरी है पढाई की खोज
अब और पढ़ा तो समझो जान गई
ठन गई , पढाई से ठन गई




इन्टरनेट का खेल है ये
ऑरकुट और फेसबुक का मेल है ये
बड़ा सुंदर जेल है ये
एक अदृश्य दुनिया में रोज़ खो जाना
साला पढ़ते पढ़ते सो जाना
चैटरूम वाली पट गई
एक नयी जिंदगी बस गई
ठन गई पढाई से ठन गई ।




अब तो शुरुआत होती है १२ बजे उठने से
क्या करे मन जो अब गया है अब पढने से
पढलिख कर भी क्या करना है
एक दिन तो वैसे ही मरना है
गर्लफ्रेंड के ख्वाब में तन्मयता से खो जाता है
इंडिया के फ्यूचर रोज़ सो जाता है
पढाई का बढ़ गया है टेंशन
पर हॉस्टलवाले कहते है नो मेंशन
रात भर गर्लफ्रेंड से बात करते है
दिन भर लैपटॉप पर गर्व से मुवियाँ देखते है
हॉस्टल लाइफ दिलो दिमाग में ठस गई
ठन गई पढाई से ठन गई




मन में २४ घंटे लडकियों का वास
बना फिरता हू देवदास
जाना चाहता हू वनवास
पर पहुच जाता हू हौजखास
मै किशन वो राधा जीवन आधा
पढाई में यही तो है बाधा
रोज़ छोले चावल की प्लेट सामने आजाती है
पढाई तो अधर में चली जाती है
पूरी दुनिया मुझ पर हँस गई
ठन गई पढाई से ठन गई





खुद से कोई गिला नहीं
अगर पढने को कोई साथी मिला नहीं
वैसे भी कौन पढता है
क्या मेरी बुद्धि में भला इतनी जड़ता है
यहाँ तो सब खुले सांड है
क्युकी गोल्डफ्लेक और गोडांग गरम यहाँ के नए ब्रांड है
इन आदतों से तो जिन्दगी बच गई
पर हॉस्टल लाइफ जच गई
ठन गई पढाई से ठन गई।

Thursday, January 14, 2010

तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले


मेरे सपनो की दुनिया में एक खूबसूरत सा शहर था ,
जिसके पास एक शजर था जहाँ एक लड़की का घर था ,
जब जब में वहाँ से गुजरता था ,
अक्सर एक ही बात किया करता था ,
की तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले ।


एक समय की बात थी ,
जब मुझे उसकी तलाश थी ,
बस यही गुनाह मै रोज़ किया करता था ,
दिन मै २-३ बार उसके घर के चक्कर काट लिया करता था ,
और उस मोहल्ले के मवालियों को अक्सर ललकारते हुए कहा करता था
की तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले


जब जब वो लड़की मेरे मोबाइल पर मिस कॉल करती थी
तो मै सोचता था की दुनिया मै बस वही एक मिस है जो मुझे कॉल करती थी
मिस का कॉल आते ही मै अपनी बाइक लिए फिर उसी मोहल्ले की तरफ निकल पड़ता था
किसी की न सुनता और कभी कभी घरवालो से भी लड़ लिया करता था
और मोहल्ले से गुजरते हुए उसकी आँखों मै देखते हुए कहता था
की तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले ।




इस तरह धीरे धीरे बात आगे बढ़ने लगी
और जिन्दगी की रेलगाड़ी प्लेटफॉर्म पर चढ़ने लगी ,
पर मुझे नहीं पता था की इस प्लेटफॉर्म पर बहुत से कुली खड़े होंगे
जो उसके लिए हसते हसते सूली चढ़ने चले होंगे
एक दिन मुझे पता चला की आज उसकी शादी है
मैंने सोचा अब और क्या बचा बाकी है
मै फिर से अपने दुःख को समेटे उसकी मोहल्ले की तरह यह कहते हुए निकल पड़ा
की आज भी तेरे कूचे से हम बड़े बेआबरू होकर निकले

Monday, January 11, 2010

पहचान कौन ?



एक दिन अचानक किसी लड़की का फ़ोन आया
मेने फ़ोन झट से उठाया
मेने पुछा कौन बोल रहा हे
उसने कहा में बोल रही हू
मैंने कहा मै तो बकरी बोलती है
उसना कहा फिलहाल तो तेरे फोन पे एक छोकरी बोलती है
मैंने सोचा क्यु न हो जाऊ एकदम मौन ...
तभी अचानक उसने कहा पहचान कौन ?


मैंने कहा तू तो जरुर अंजलि होगी
उसने कहा नहीं ये तो कोई करमजली होगी
तभी मेने अपने जुओं से भरा सर खुजाया
और तभी मेरे दिमाग में एक आईडिया आया
मैंने कहा सच सच बता तू है कौन ?
उसने फिर से कहा पहचान कौन ?


अब मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था
दिल है की धड़का जा रहा था
मैंने कहा तू मुझे इतना मत सता
उसना कहा तो चुपचाप मेरा नाम बता
मैंने तुतलाते हुए कहा क्या मैंने तुझे छेला है
उसना कहा सच सच बता तेरा कितनी लडकियों से झमेला है
मैंने कहा ये सब पूछने वाली तू है कौन
उसने फिर से कहा तो पहचान कौन ??



मुझसे हुई ये खता मुझे तेरा नाम नहीं पता
उसने कहा तू तो है ही गधा जो तुझे कुछ नहीं पता
मैंने कहा क्यु बजा रही है मेरी जुन्दगी की रिंगटोन
उसने फिर से कहा पहचान कौन /??



मेरे भेजे में फिर से एक लड़की का नाम आया
और मेने इस बार बिना सर खुजाये कुछ इस अंदाज़ में गया की --
जादू तेरी नज़र खुशबु तेरा बदन तू हा कर या न कर तू है मेरी किरन
उसने कहा -
जादू तेरी नज़र खुशबु तेरा बदन तू हां कर या न कर मै हू तेरी बहन ...






बहन सुनते ही मेरे दिल के अरमान टूट गए
और मेरे गर्लफ्रेंड के ख्वाब टूट गए
मै अपने ख्वाबो से बहार निकल आया
और रजाई ओड़ के चुपचाप सो गया
की अब न उठाऊंगा कभी फ़ोन
ताकि कोई कह न सके पहचान कौन ?????