Tuesday, January 1, 2013

सैया दिखात है मिडिल फिंगर

सैंया रेड लेबल पियत है
बॉडी टोटल मैसअप है
देखत उनको हमरे मुह निकले ये वर्ड्स है
ही इज जस्ट लाइक ग्रोन अप्स है
समझे खुदको टॉम क्रूज़
ही इज हैविंग लेदर शूज
हो ..ही इज हैविंग लेदर शूज  - 2
अरि हम तो फस गए है गृहणी बनकर
सैंया दिखात है मिडिल फिंगर ...-2

कलेक्टोरेट के है बड़े बाबू
नहीं है हमरा इन पर काबू
बनते है टिप - टॉप
बाय कैरिंग लैप -टॉप
हो बाय कैरिंग लैप - टॉप ......
चखने में लेते है रेवड़ी
समझे है खुद को देव डी
फैमिली मै हो गई है डिस्प्यूट
क्योकि सैयाजी हैविंग एटीट्युड
हो सैयाजी हैविंग एटीट्युड
किसी दिन देंगे हमभी कनपट्टी पे रखकर
सैंया दिखात है मिडिल फिंगर - 2

ऑफिस मे हो जाती है शाम
देन ही मेक्स अ फ़ोन कॉल
शादी को हो गए है 20 साल
अब नहीं लगते हम उनको माल
ही इज लिसनिंग म्यूजिक
एंड आई एम फेसिंग म्यूजिक
हिअर कम्स द पेन
ही इज ट्राइंग टू बी ए जेंटलमेन
डाउनलोड है सारी एप्स
तकिये के नीचे रखते है रेपिडेक्स
वेन आई वांट टू हेव अ वर्ड
ही इज बीइंग एंग्री बर्ड
मुश्किल हो गई है दाम्पत्य जीवन की डगर
सैया दिखात है मिडिल फिंगर - 2














Tuesday, September 7, 2010

कमबख्त बालतोड़

शारीरिक दंगल ,
ह्रदय अमंगल ,
चेहरे का मर्म ,
रोगान्तक चर्म ,
असहनीय पीड़ा ,
मनो कम्बल में घुस गया हो कोई कीड़ा ,
बन गई है जी का जंजाल,
ये अप्राकृतिक नपुंसक चाल ,
प्रबल हुई आत्मसमर्पण की भावना ,
पूरी हुई नंग्न विचरण की कामना ,
ऐसे ओढ़ी जा रही है चादर ,
मनो गागर में सागर ,
सबकी यही गत्या है ,
यह तो शाश्वत सत्य है ,
ख़त्म हुई शारीरिक सौंदर्य की होड़ ,
उफ़ ! ये कमबख्त बालतोड़ ।


बदली दिनचर्या , छूटे विलास भोग ,
चरमोत्कर्ष पर आ चूका है यह रोग ,
इसी रोग की सौगात है ,
की गुसलखाने में सोना जैसे अब आम बात है ,
आयुर्वेद बेअसर , एलोपैथी मना है ,
बहुत बड़ी विडम्बना है ,
निढाल नेत्र , असहाय शारीर ,
करवाते बदलती मेरी तकदीर ,
बड़ी भयंकर मज़बूरी है ,
ये फोड़ा तो नासूरी है ,
निगाहें फलक पे है
जान हलक में है
यही है सादा जीवन उच्च विचार का निचोड़
उफ़! ये कमबख्त बालतोड़ ।

Saturday, August 28, 2010

ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या ...


एक बूंद भर उजाले की टंकार
चहुँओर हाहाकार
बंद कमरे की तपिश
चंद आकांक्षाओ से लबालब कशिश
गरीब के आँखों से बहते निर्झर झरने
नेताओ के चौराहों - नुक्कड़ो पर धरने
कोई दिखाए ना दया
ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या ।


जल रहे है अंदर ही अंदर
कहाँ गए बापू के वो तीनो बन्दर
सत्य - अहिंसा कौड़ियों के भाव बिक गयी
सत्ता भी जैसे तैसे चल गयी
बेसुध घूमते अत्याचारी , बलात्कारी
पाप की लंका है निरंतर , सकुशल जारी
मन में कोई भय ना हया
ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या


महामारी का दौर है
दवाइयों पर गौर है
बड़ी मेहनत से सपनो का खेत था जोता
बिना घूस के काम ही नहीं होता
कल्पनाओ को मुखाग्नि देकर
निकल पड़ते है लज्जित से भावविहीन होकर
काम की तलाश में दिल्ली , पटना या गया
ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या ।

Wednesday, August 4, 2010

कराहते मुल्क में कॉमनवेल्थ का काकस


आजादी के ६३ साल बाद तक भी गुलामी की जिन निशानियो को हम छाती से चिपकाये घूम रहे है उनमे से एक है कॉमनवेल्ट गेम । कॉमनवेल्थ क्या है ? कॉमनवेल्थ वो देश है जो अंग्रजो के उपनिवेश , गुलाम देश रहे है जिनका खून चूस - चूस कर ब्रिटेन की समृद्धि का महल खड़ा किया गया । ऐसे लगभग १५ देश है और ये मिलकर जब खेलते है तो इसे ही कॉमनवेल्थ गेम कहा जाता है । इसके उदघाटन में ब्रिटेन की महारानी के प्रतिक के रूप में एक छड़ी लाई जाती है जिसे क्वीन्स बेट कहा जाता है फिर ये तमाशा परवान चढ़ता है । दिल्ली में इस नौटंकी के लिए २०० करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे है , इस खेल में जो होगा वो तो होगा ही इसके पहले ठेकों , रिश्वत और टेंडर का खेल खेला जा रहा है । इस धमाचौकड़ी में नेताओ और ठेकोदारो की पांचो उंगलिया घी में नहीं है पूरा बदन कढ़ाई में डूबा हुआ है जिस पर मक्खिया भिनभिना रही है ।
उस देश में जहाँ लाखो बच्चे फ़ुटबाल की गेंद नहीं पहचानते , विद्यालयों में खेलने को तो दूर पढने की भी जगह नहीं है वह ये तमाशा कब तक जायज़ है, इन पैसो से पूरे देश में खेलकूद का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार हो सकता है , मैदान बन सकते है और पूरी युवा पीढ़ी को खेल संस्कृति से नहलाया जा सकता है लेकिन ये नहीं हुआ इसके बजाये हुआ है दिल्ली के सौन्दर्यीकरण के नाम पर गरीबो की बर्बादी । चूँकि कॉमनवेल्थ गेम है इसलिए विदेशी गोरे आयेंगे उन्हें कही झोपडी ना दिख जाये वरना देश क नाक कट जाएगी । दिल्ली वासियों को भले ही पिने का पानी न मिले पर परदेसियो को एक्वाफिना और बियर जरुरी है , दिल्ली के स्कुलो में बच्चो को मध्यान्ह भोजन न मिले पर गोरो को बीफ (गो मांस) परोसने की तैयारिया हो चुकी है , जो विरोध कर रहे है अगर वो सत्ता में होते तो खुद इस बाजीगरी पर ठुमक रहे होते । खेल के नाम पर या तो इस देश में क्रिकेट पर जुआ होता है या ऐसे हात बाज़ार । सही में अगर हमारे कर्णधार खेलो का भला चाहते तो देश में हाकी और फ़ुटबाल की ये महादशा नहीं hoti ।

Thursday, January 28, 2010

अमर घर चल ....


१९७४ में जब जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति के शेषनाग से राजनीती का समुद्र मथा था तो उसमे से कई रत्न प्रकट हुए थे । मुलायम सिंह यादव उनमे से एक थे बाद में वे जनता दल के प्रमुख नेता रहे और आखिरकार जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने कमंडल से मंडल आयोग के अंगारे देश भर में छींटे तो मुलायम सिंह ने अपनी झोली भर ली , आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में चल रहे राजनीतिक ब्राम्हिन भोज में मुलायम सिंह ने कंकर दाल दिए । देश भर के केसरिया आंधी मुसलमानों ने मुलायम सिंह पर इस कदर भरोसा किया की वि मुल्ला मुलायम तक कहलाये । इन्ही मुलायम सिंह की राजनीतिक पकड़ को एक चतुर राजनीतिज्ञ ने भांप लिया और उनमे केचुली के तरह जा चिपका वो थे अमर सिंह । अमर सिंह उस ज़माने में कांग्रेस की छोटी मोती पोलिटिक्स किया करते थे , उसकी व्यापारिक बुद्धि ने केलकुलेट कर लिया था की इस पहलवान के दावो के भरोसे वो दिल्ली तक मर कर सकते है । अमर सिंह जोड़ तोड़ और लंच डिनर के पोलिटीशन थे , वे लोगो पर एहसान करते और फिर उसकी कीमत वसूलते
,
सदी के महानायक अमिताब बच्चन को उन्होंने तब पकड़ा जब वो डूब रहे थे इसी को वो कैश कराकर अमित जी को जया ऐश्वर्या और अभिषेक सहित मुलायमी अखाड़े में खीच लाये । समाजवादी पार्टी के टाट पर उन्होंने जया प्रदा और संजय दत्त जैसे मखमली पैबंद चिपकाये । हालत धीरे धीरे ये हो गए की मुलायम सिंह अमर सिंह से पूछे बगैर जम्हाई भी नहीं लेते थे । जनता दल के जमीन से जुड़े नेताओ के पत्ते काटने लगे , आजम खान जैसे कद्दावर और राज बब्बर जैसे सुलझे हुए नेता अमर सिंह की शकुनी चलो का शिकार होते गए , लेकिन धीरे धीरे मुलायम के करीबी लोग चेते और और उन्होंने पहेलवान मुलायम की ओवर ओइलिंग करना शुरू कर दी , कल्याण सिंह को लाने के लिए उन्होंने मुलायम सिंह से शीर्षासन तक करवा दिया ।

ज़ाहिर है उनके सबसे विश्वस्त वोट बैंक मुस्लमान उनसे दूर जाने लगे , नतीजतन वो हर चुनाव में मात खाते गए । अचानक मिली हार ने मुलायम के भाई राम गोपाल यादव जैसो के कान खड़े कर दिए । और सबने मिलकर वीरू और जय की जोड़ी को विखंडित कर दिया । पहले अमर सिंह जब भी इस्तीफे की धमकी देते थे मुलायम खुद हाथ पैर जोड़ कर उन्हें वापस ले आते थे पर अबकी उन्हें मनाने कोई नहीं गया । ऐसा कोई दल नहीं बचा जिसमे अमर सिंह को पनाह मिले । शारीर और मन दोनों से थक चुके अमर सिंह को अब पता चल चुका है कि ड्राइंगरूम , पंचातारो , सितारों और शेरो शायरी की राजनीति ने उन्हें एकाकीपन के ऐसे रेगिस्तान में प्यासा छोड़ दिया है , जहाँ से निकलने का तोड़ उन्होंने सिखा ही नहीं । मुलायम सिंह की नर्सरी बुक में अब 'अ' अमर सिंह का कभी नहीं पढ़ा जायेगा ।

Wednesday, January 27, 2010

फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ....


ब्रिस्लारी की बोटल है ,
५ स्टार होटल है ,
मेकडोनाल्ड और पिज्जा हट का अम्बार है ,
आज गली गली में बियर बार है ,
रोलेक्स की घड़िया हाथों में सजी ,
पीटर इंग्लैंड से बाहें कसी,
घर में नहीं आटा ,
पैरो में बाटा ,
यहाँ तो सभी जगह नेम एंड फेम है ,
भला कोई मनुष्य नहीं ब्रांड नेम है ,
यही है आज के आजाद भारत की कहानी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ।




मंदी की मार है ,
आम आदमी की हार है
चारो और चाटूकार है ,
नेता मस्त है ,
जनता त्रस्त है ,
याद आ गए आटे दाल के भाव ,
जब खाने को रह गया सिर्फ बड़ा पाव ,
पिने को नहीं है साफ़ पानी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी




कोक , पेप्सी और थुम्स अप महफ़िल में है ,
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है ,
अलगाववाद और भाषावाद हावी है ,
जागरूक रहना अवश्यभावी है,
युवा भटक रहा है ,
नेता खटक रहा है ,
मल्टीनेशनल कंपनियों को मेला है ,
बड़ा गड़बड़ झमेला है ,
हर तरफ से हानि ही हानि,
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी,







आतंकवादी , नक्सलवादी , बढती आबादी
गायब हो गई बापू की खादी ,
बापू ने नमक कानून तोड़ा ,
तो हमने इंडियन पेनल कोड का हर कानून तोड़ा ,
किसानो की बदहाली है,
चारो तरफ कंगाली है,
यही है आज के गणतंत्र की कहानी ,
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ।

Friday, January 15, 2010

पढाई से ठन गई !


ठन गई ठन गई
पढाई से ठन गई
किताबो से जूझने का मेरा कोई इरादा न था
कभी पढूंगा इसका कोई वादा न था
खुद से करके वादा में कहता हु रोज़
बस अब न करूँगा और मौज
परन्तु खता जो हू शाहीभोज
सो अब भी जरी है पढाई की खोज
अब और पढ़ा तो समझो जान गई
ठन गई , पढाई से ठन गई




इन्टरनेट का खेल है ये
ऑरकुट और फेसबुक का मेल है ये
बड़ा सुंदर जेल है ये
एक अदृश्य दुनिया में रोज़ खो जाना
साला पढ़ते पढ़ते सो जाना
चैटरूम वाली पट गई
एक नयी जिंदगी बस गई
ठन गई पढाई से ठन गई ।




अब तो शुरुआत होती है १२ बजे उठने से
क्या करे मन जो अब गया है अब पढने से
पढलिख कर भी क्या करना है
एक दिन तो वैसे ही मरना है
गर्लफ्रेंड के ख्वाब में तन्मयता से खो जाता है
इंडिया के फ्यूचर रोज़ सो जाता है
पढाई का बढ़ गया है टेंशन
पर हॉस्टलवाले कहते है नो मेंशन
रात भर गर्लफ्रेंड से बात करते है
दिन भर लैपटॉप पर गर्व से मुवियाँ देखते है
हॉस्टल लाइफ दिलो दिमाग में ठस गई
ठन गई पढाई से ठन गई




मन में २४ घंटे लडकियों का वास
बना फिरता हू देवदास
जाना चाहता हू वनवास
पर पहुच जाता हू हौजखास
मै किशन वो राधा जीवन आधा
पढाई में यही तो है बाधा
रोज़ छोले चावल की प्लेट सामने आजाती है
पढाई तो अधर में चली जाती है
पूरी दुनिया मुझ पर हँस गई
ठन गई पढाई से ठन गई





खुद से कोई गिला नहीं
अगर पढने को कोई साथी मिला नहीं
वैसे भी कौन पढता है
क्या मेरी बुद्धि में भला इतनी जड़ता है
यहाँ तो सब खुले सांड है
क्युकी गोल्डफ्लेक और गोडांग गरम यहाँ के नए ब्रांड है
इन आदतों से तो जिन्दगी बच गई
पर हॉस्टल लाइफ जच गई
ठन गई पढाई से ठन गई।