Tuesday, September 7, 2010

कमबख्त बालतोड़

शारीरिक दंगल ,
ह्रदय अमंगल ,
चेहरे का मर्म ,
रोगान्तक चर्म ,
असहनीय पीड़ा ,
मनो कम्बल में घुस गया हो कोई कीड़ा ,
बन गई है जी का जंजाल,
ये अप्राकृतिक नपुंसक चाल ,
प्रबल हुई आत्मसमर्पण की भावना ,
पूरी हुई नंग्न विचरण की कामना ,
ऐसे ओढ़ी जा रही है चादर ,
मनो गागर में सागर ,
सबकी यही गत्या है ,
यह तो शाश्वत सत्य है ,
ख़त्म हुई शारीरिक सौंदर्य की होड़ ,
उफ़ ! ये कमबख्त बालतोड़ ।


बदली दिनचर्या , छूटे विलास भोग ,
चरमोत्कर्ष पर आ चूका है यह रोग ,
इसी रोग की सौगात है ,
की गुसलखाने में सोना जैसे अब आम बात है ,
आयुर्वेद बेअसर , एलोपैथी मना है ,
बहुत बड़ी विडम्बना है ,
निढाल नेत्र , असहाय शारीर ,
करवाते बदलती मेरी तकदीर ,
बड़ी भयंकर मज़बूरी है ,
ये फोड़ा तो नासूरी है ,
निगाहें फलक पे है
जान हलक में है
यही है सादा जीवन उच्च विचार का निचोड़
उफ़! ये कमबख्त बालतोड़ ।

10 comments:

पुस्‍तकायन said...

आनंद आ गया

अशोक बजाज said...

लाजवाब .

पोला की बधाई भी स्वीकार करें .

LUCKY said...

hahhaa... nice 1 bro.. peeda me bhi peda

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!

Prashant said...

बहुत बढ़िया, मज़ा आ गया .. अपने प्रकार की अनूठी रचना ...

मनोज कुमार said...

रोचक! मज़ेदार!!

आंच पर संबंध विस्‍तर हो गए हैं, “मनोज” पर, अरुण राय की कविता “गीली चीनी” की समीक्षा,...!

Ashok K Pandey said...

kambakhat ... super set hai, mujhe 2 sal purane apne baltod ki chubhan yaad aa gai.

hindi mein sabd kaise dalu nahi janta , so roman-hindi swikar ho

dhan dhan ek bar phir

uttam singh said...

उम्दा रचना है. बालतोड़ क्या हुआ, हाहाकार मच गया. दर्द ऐसा उठा कि पलंगतोड़ हो गया.

amar jeet said...

बदलते परिवेश मैं,
निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
कोई तो है जो हमें जीवित रखे है,
जूझने के लिए प्रेरित किये है ,
उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
यही शुभकामनाये!!
दीप उत्सव की बधाई .............

sanjay jaan said...

bahut.. khoob... kripaya... monetize or design mein jakar add tools mein se subcribtion by mail ko add kar le taki humein aasani se blog updates milti rahe...
thanks.....
www.sanjayjaan.blogspot.com