
एक बूंद भर उजाले की टंकार
चहुँओर हाहाकार
बंद कमरे की तपिश
चंद आकांक्षाओ से लबालब कशिश
गरीब के आँखों से बहते निर्झर झरने
नेताओ के चौराहों - नुक्कड़ो पर धरने
कोई दिखाए ना दया
ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या ।
जल रहे है अंदर ही अंदर
कहाँ गए बापू के वो तीनो बन्दर
सत्य - अहिंसा कौड़ियों के भाव बिक गयी
सत्ता भी जैसे तैसे चल गयी
बेसुध घूमते अत्याचारी , बलात्कारी
पाप की लंका है निरंतर , सकुशल जारी
मन में कोई भय ना हया
ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या
महामारी का दौर है
दवाइयों पर गौर है
बड़ी मेहनत से सपनो का खेत था जोता
बिना घूस के काम ही नहीं होता
कल्पनाओ को मुखाग्नि देकर
निकल पड़ते है लज्जित से भावविहीन होकर
काम की तलाश में दिल्ली , पटना या गया
ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या ।